डर नहीं जागरूकता जरूरी है कैंसर की सही समझ, कैंसर के बारे में सच जानें गलतफहमियों से बचें

डर नहीं जागरूकता जरूरी है कैंसर की सही समझ, कैंसर के बारे में सच जानें गलतफहमियों से बचें

मुरादाबाद: कैंसर आज भी उन बीमारियों में से एक है, जिसके बारे में समाज में कई गलत धारणाएं फैली हुई हैं। इन मिथकों के कारण लोगों में अनावश्यक डर पैदा होता है और कई बार वे सही समय पर सही इलाज लेने से भी हिचकते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम कैंसर से जुड़े भ्रम और सच्चाई के बीच स्पष्ट अंतर समझें।


अक्सर यह माना जाता है कि कैंसर का मतलब निश्चित मृत्यु है। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले कुछ दशकों में कैंसर के इलाज और डायग्नोसिस में काफी प्रगति हुई है। आज लाखों लोग इलाज के बाद पूरी तरह कैंसर-मुक्त जीवन जी रहे हैं और कई मरीज कैंसर को एक क्रॉनिक कंडीशन की तरह मैनेज कर रहे हैं। शुरुआती पहचान और एडवांस ट्रीटमेंट ने कई प्रकार के कैंसर में परिणामों को बेहतर बनाया है।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर एवं यूनिट हेड, डॉ. प्रवीण कुमार गर्ग ने बताया “कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि कैंसर छूने, साथ बैठने या खाना साझा करने से फैल सकता है। यह पूरी तरह गलत है। कैंसर संक्रामक नहीं है। यह शरीर की कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि के कारण होता है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। हालांकि, कुछ वायरस जैसे एचपीवी या हेपेटाइटिस बी संक्रमण के जरिए फैल सकते हैं और कैंसर का रिस्क बढ़ा सकते हैं, लेकिन स्वयं कैंसर कभी संक्रामक नहीं होता। एक आम धारणा यह भी है कि चीनी (शुगर) कैंसर को बढ़ावा देती है और शुगर बंद करने से कैंसर खत्म हो सकता है। हकीकत यह है कि सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के लिए ग्लूकोज की आवश्यकता होती है। केवल शुगर बंद कर देने से कैंसर कोशिकाएं खत्म नहीं होतीं। हालांकि, अत्यधिक शुगर से मोटापा बढ़ सकता है, जो कई कैंसर का एक वास्तविक रिस्क फैक्टर है। इसलिए संतुलित आहार और हेल्दी लाइफस्टाइल जरूरी है।“


कई लोग तथाकथित ‘सुपरफूड्स’ को कैंसर से बचाव या इलाज का जादुई उपाय मानते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि कोई भी एकल भोजन कैंसर को रोक या ठीक नहीं कर सकता। फल, सब्जियां, होल ग्रेन्स और लीन प्रोटीन से भरपूर डाइट समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है और कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन केवल डाइट के भरोसे इलाज संभव नहीं है। ऐसे उत्पादों या दावों से सावधान रहना चाहिए जो सिर्फ खान-पान से कैंसर ठीक करने का वादा करते हैं।


डॉ. प्रवीण ने आगे बताया “मोबाइल फोन के इस्तेमाल से कैंसर होने की बात भी अक्सर सुनने को मिलती है। लेकिन दशकों के शोध में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है जो मोबाइल फोन और कैंसर के बीच सीधे संबंध को साबित करे। मोबाइल से निकलने वाली रेडियोफ्रीक्वेंसी एनर्जी नॉन-आयोनाइजिंग होती है, जो डीएनए को वैसे नुकसान नहीं पहुंचाती जैसे एक्स-रे या अल्ट्रावायलेट किरणें पहुंचा सकती हैं। यह भी एक मिथक है कि कैंसर केवल बुजुर्गों को होता है। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का जोखिम बढ़ता है, लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है, यहां तक कि बच्चों और युवाओं में भी। इसलिए हर उम्र में लक्षणों के प्रति सजग रहना और हेल्दी आदतें अपनाना जरूरी है।


कई लोग यह सोचते हैं कि यदि परिवार में कैंसर का इतिहास है तो उन्हें भी निश्चित रूप से कैंसर होगा। वास्तव में केवल 5 से 10 प्रतिशत कैंसर ही वंशानुगत होते हैं। पारिवारिक इतिहास से जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन यह तय नहीं करता कि बीमारी जरूर होगी। वहीं, अधिकांश कैंसर मरीजों का कोई पारिवारिक इतिहास नहीं होता। जिन लोगों के परिवार में कई सदस्यों को कैंसर रहा है, उनके लिए जेनेटिक काउंसलिंग उपयोगी हो सकती है।


यह धारणा भी गलत है कि कैंसर से बचाव के लिए कुछ नहीं किया जा सकता। लगभग एक-तिहाई सामान्य कैंसर जीवनशैली में बदलाव से रोके जा सकते हैं। तंबाकू से दूरी, स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि, शराब का सीमित सेवन और धूप से त्वचा की सुरक्षा जैसे कदम कैंसर के जोखिम को काफी हद तक कम करते हैं। नियमित स्क्रीनिंग भी कई कैंसर की शुरुआती पहचान में मदद करती है, जिससे इलाज की सफलता की संभावना बढ़ जाती है।


कैंसर के बारे में सही जानकारी हमें डर नहीं, बल्कि समझदारी से निर्णय लेने की शक्ति देती है। जागरूकता, समय पर जांच और वैज्ञानिक इलाज ही कैंसर के खिलाफ हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं।

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